मन की बात
कहूँगा अगर सुनोगे तो
चीखूंगा गर अनसुना कर दोगे
इस दायरे में बांध कर
अदना महसूस करता हूँ
दूसरो की सुन कर बंधुआ महसूस करता हूँ
आशय जीवन का सुर हीन हो गया है
व्यथित मन है
आहत हूँ
चाहता हमेशा हूँ किसी से व्यक्त करूँ
पर इस व्यथा को पी लेता हूँ
अपने आप पर क्रोधित हूँ
पर निवारण से अनजान
क्या सुनोगे मुझे तुम
खुद को अनसुना करता हूँ
मन की बात शायद इसी तरह रखता हूँ .
चीखूंगा गर अनसुना कर दोगे
इस दायरे में बांध कर
अदना महसूस करता हूँ
दूसरो की सुन कर बंधुआ महसूस करता हूँ
आशय जीवन का सुर हीन हो गया है
व्यथित मन है
आहत हूँ
चाहता हमेशा हूँ किसी से व्यक्त करूँ
पर इस व्यथा को पी लेता हूँ
अपने आप पर क्रोधित हूँ
पर निवारण से अनजान
क्या सुनोगे मुझे तुम
खुद को अनसुना करता हूँ
मन की बात शायद इसी तरह रखता हूँ .
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