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आदमी

इस युग  के मायाजाल में बंदी बना है आदमी अपनों से ही खेल रजाए जा रहा है आदमी स्वप्नो की परिभाषाये बदल रहा है आदमी कही अपनों को लुटे कही परयो से रूठे नैतिकता के मापो में गिर रहा है आदमी स्वार्थो को साधे किन साधनो से खुद से ही कटता जा रहा है आदमी कल के मित्र आज के शत्रु बनाये जा रहा है आदमी कागज़ से सम्बन्धो को तौल  रहा है आदमी आशा निराशा के फेर में फँस रहा है आदमी उम्मीदों से घिर कर टूट रहा है आदमी काल से बैर कर उन्नत कर रहा है आदमी सतयुग के रावण सा कलयुग का राम है देवो को निराश कर रहा है, इस युग का आदमी कभी मिलो उस ईश्वर से , उनसे ये ज़रूर कहना भगवन अब  अवतार न लेना, खुद के नाश में ही अग्रसर है आदमी भूल गया कि सब नश्वर है, फिर भी जिये जा  रहा है आदमी ।